माँ

- Ramkrishna , Hindi Tarang

2017-02-16

Cultural

की जग कर रात भर उसने ,
सिर्फ हमको सुलाया है !
सर्द रातों में हर एक पल...
हमें कम्बल उढाया है।
बाँध पल्लू में मंदिर का वो थोड़ा सा "मुकुंदाना",
ज़माने से बचा कर के उसने हमको खिलाया है।
बिछड़ते वक़्त वो आँसूं उसने क्यूँ बहाए थे ?
जबकि मालूम था उसको मैं फिर से लौट आऊंगा!
लेकिन भनक इस बात की उसको सताती थी...
कि मैं दुनिया का हो जाऊं तो उसका हो न पाउँगा ;
इसी स्याही से हर इक माँ को ये पैगाम लिखता हूँ....
की इक पल भी अगर तू याद न आई तो सुन ले माँ।
मै दुनिया छोर कर सारी तेरे ही पास आऊंगा।
मैं छत पर सूखते कैरी चुरा कर फिर से खाऊंगा।